सुनो एक योजना है।

जब तलक पूरी न होगी,
इस जहाँ में जिद हमारी।
जुबाँ पर फरियाद होगी,
अवज्ञाएँ फिर हमारी।
जब तलक ना वक्त साथी,
दुख तो यूँ ही भोगना है।
सुनो……….

लालसा कुछ छोड़ दें,
संशय की गागर फोड़ दें।
ओज मन में संचरित कर,
भ्रमित मन झकझोर दें।
दो कदम हर रोज़ चलकर,
लक्ष्य को ही सोचना है।
सुनो……….

इन खगों से सीख लें,
गगन में उनमुक्त उड़ना।
तिनका-तिनका जोड़कर,
नीड़ सा सपनों को बुनना।
अब नहीं रुकेंगे थककर,
अब यही परियोजना है।
सुनो………….

खुश्बू जानी-पहचानी थी

मुद्दतों बाद वो दिखे मुझे,
पर अपनों की निगरानी थी,
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

एक दिवस मैं गया था,
लेने कुछ सामान,
कोई बगल से गुजरा,
जिसकी खुश्बू थी आसान।
आगोश किसी का याद आया,
मन में अन्तर्नाद हुआ,
पीछे मुड़कर देखा तो,
थे अपने नाफ़र्मान।।

दिल में था प्रेमभाव और
कदमों की नातवानी थी।
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

तो याद करना

कोई दर्द, कोई चुभन जब हद से गुजर जाए,तो याद करना,
जिन्दगी में कभी जरूरत पड़ जाए,तो याद करना।

बिछड़ते वक्त के ये आखिरी, अल्फाज थे उनके,
जो अब तक सम्भाले रक्खा, यही राज थे उनके।
ये वो पल थे जो,अब तक भुलाये न गये,
मैने छिपाये रक्खा,जो हमराज थे उनके।
उसने तड़प के कह दिया, न बर्बाद करना,
जिन्दगी में कभी जरूरत पड़े,तो याद करना।

उस वक्त इज़्तिराब में, सोचा न गया,
आँसू भी रुखसार का,पोंछा न गया।
उसने छिपाए दर्द,दामन के आड़ में,
मुझसे छुपाया अश्क,समूचा न गया।
गैरों के सामने न,फरियाद करना,
जिन्दगी में कभी जरूरत पड़ जाए,तो याद करना।

ये कैसी बारिश आई है

नभ के हर कोने पर,तेरी ही रानाई है,
ये कैसी बारिश आई है।

अधरों के तपते शोलों पर,शबनम की बूँद लुभाई है,
सदियों से प्यासे तन-मन की, प्यास और भड़काई है।
पर मैने मन की उत्कृन्ठा,मन में ही दफनाई है,
मेघों की उमड़-घुमड़ मे जैसे,तेरी ही अंगड़ाई है।
ये कैसी बारिश आई है।

तन मे गिरती हर बुँदों का,ख़लिश और तड़पाती है,
यादें तेरी नख-शिख की अब,रह-रहकर आती-जाती है।
काजल तेरे अब्सारों का,मांथे की बिंदिया दीवानी,
मुझको और सताती है,यादों का चुभन बढ़ाती है।
ऐसे मौसम में भी तेरे,यादों की बदली छाई है,
ये कैसी बारिश आई है।