दुनिया को किसने बांटा था

कौन थे वे लोग जिन्होंने लकीरें खींची थी,
कौन थे वे लोग जिन्होंने हिन्दू, मुसलमान में फर्क बताया था,
कौन थे वे लोग जिन्होंने देहृलीजे पार करने से मनाही कहीं थी,
कौन थे जिन्होंने औरतों को कमजोर बताया था,
कौन थे जिन्होंने यह धर्म को स्थापित कर चार वर्ण समझाये थे,
कौन थे जिन्होंने इंसानों को इंसानों से ही बांट डाला था,
कौन थे वे लोग जिन्होंने आंतकवाद फैलाया था,
कौन थे वे लोग जिन्होंने भगवान बन कर, इस दुनिया पर नियम बना दिए है,
जिस शांति की कामना रख, यह वर्ण,रेखाएं,धर्म,उंच, नीच बना,
किस तरह बिखर गया है उसी तरह इंसान का अस्तित्व..

कोई तो है

सोई हुई रातों में, धड़कनें बढ़ाती है,
कोई तो है जो दिल को लुभाती है।

उस बात की आज भी, देखिए खुमारी है,
मुस्कुराकर जब कहा था,जान भी तुम्हारी है।
यादों में रह-रह कर,आती औ जाती है,
कोई तो है………..

नटखट उन अदाओं पर, गीत क्या लिखेंगे अब,
वर्षों की दरमियाँ और विरह क्या लिखेंगे अब।
वक्त की मार हर शख्स को रूलाती है,
कोई तो है………..

बेटियाँ

बेटियाँ कच्चे बाँस की तरह,
पनपती आधार हैं।

बेटियाँ ही अनवरत,
प्रकृति की सृजनहार हैं।

किसी भी संदेह में ना,
उन्हें मारा जाय।
उनको भी स्नेह की,
छाँव में दुलारा जाय।

इनसे ही श्रृगार धरा का,
इनसे ही भूमि पावन।
जगत जननी अयुज बेटियाँ,
इन्हें करें सौ बार नमन।

समानता को संकल्प बना,
आगे इनको बढ़ाया जाय।
भूल रूढ़ियाँ सभी चलो,
हर बेटी को पढ़ाया जाय।

पत्रकार

आइना थे एक पक्ष के पक्षकार हो गए,

सियासत में पड़कर ये भी बेकार हो गए।

हर बात को सफाई से दुनिया को बताने वाले,

आज जाने क्यों बिकाऊ पत्रकार हो गए।

उलाहना

पथरीली राहों पर तुम गुलाब माँगते थे,

हर बात का उछल कर जवाब माँगते थे।

वक्त का करवट देखो तुम्हें भी देना पड़ेगा,

जैसे तुम बात-बात पर हिसाब माँगते थे।

शितलहरी

शाँन्त चित्त में जैसे इक,

उन्माद जगाती है,

सुबह-सुबह देखो शितलहरी,

कैसी आती है।

 

पेड़ों के साखों में आकर,

हर रोज़ जगाती है,

पत्तों से मिलकर वो,

रुनझुन गाती है।

शाँन्त झरोखे में भी तब,

खुशी लहराती है।

 

सुबह-सुबह देखो……….

अभी तो नहीं….

देश खोखला है, तिजोरी खाली है,

तो क्या कर्जा लेकर,ये भरने वाली है।

मुद्दों की बात भी कुछ करलो साहेब कभी,

गरीबरथ चलती नहीं,बुलेट कहाँ चलने वाली है।