कविता

कई दिनों से कविता उदास रहती है।
व्यस्त जिन्दगी में भी आसपास रहती है।
नहीं मिलता वक्त उससे मिलने का जरा भी-
इसीलिए आजकल थोडा़ खटास रहती है।।

सुनो एक योजना है।

जब तलक पूरी न होगी,
इस जहाँ में जिद हमारी।
जुबाँ पर फरियाद होगी,
अवज्ञाएँ फिर हमारी।
जब तलक ना वक्त साथी,
दुख तो यूँ ही भोगना है।
सुनो……….

लालसा कुछ छोड़ दें,
संशय की गागर फोड़ दें।
ओज मन में संचरित कर,
भ्रमित मन झकझोर दें।
दो कदम हर रोज़ चलकर,
लक्ष्य को ही सोचना है।
सुनो……….

इन खगों से सीख लें,
गगन में उनमुक्त उड़ना।
तिनका-तिनका जोड़कर,
नीड़ सा सपनों को बुनना।
अब नहीं रुकेंगे थककर,
अब यही परियोजना है।
सुनो………….

खुश्बू जानी-पहचानी थी

मुद्दतों बाद वो दिखे मुझे,
पर अपनों की निगरानी थी,
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

एक दिवस मैं गया था,
लेने कुछ सामान,
कोई बगल से गुजरा,
जिसकी खुश्बू थी आसान।
आगोश किसी का याद आया,
मन में अन्तर्नाद हुआ,
पीछे मुड़कर देखा तो,
थे अपने नाफ़र्मान।।

दिल में था प्रेमभाव और
कदमों की नातवानी थी।
खुश्बू जानी-पहचानी थी।

कोई तो है

सोई हुई रातों में, धड़कनें बढ़ाती है,
कोई तो है जो दिल को लुभाती है।

उस बात की आज भी, देखिए खुमारी है,
मुस्कुराकर जब कहा था,जान भी तुम्हारी है।
यादों में रह-रह कर,आती औ जाती है,
कोई तो है………..

नटखट उन अदाओं पर, गीत क्या लिखेंगे अब,
वर्षों की दरमियाँ और विरह क्या लिखेंगे अब।
वक्त की मार हर शख्स को रूलाती है,
कोई तो है………..

बेटियाँ

बेटियाँ कच्चे बाँस की तरह,
पनपती आधार हैं।

बेटियाँ ही अनवरत,
प्रकृति की सृजनहार हैं।

किसी भी संदेह में ना,
उन्हें मारा जाय।
उनको भी स्नेह की,
छाँव में दुलारा जाय।

इनसे ही श्रृगार धरा का,
इनसे ही भूमि पावन।
जगत जननी अयुज बेटियाँ,
इन्हें करें सौ बार नमन।

समानता को संकल्प बना,
आगे इनको बढ़ाया जाय।
भूल रूढ़ियाँ सभी चलो,
हर बेटी को पढ़ाया जाय।