ये कैसी बारिश आई है

नभ के हर कोने पर,तेरी ही रानाई है,
ये कैसी बारिश आई है।

अधरों के तपते शोलों पर,शबनम की बूँद लुभाई है,
सदियों से प्यासे तन-मन की, प्यास और भड़काई है।
पर मैने मन की उत्कृन्ठा,मन में ही दफनाई है,
मेघों की उमड़-घुमड़ मे जैसे,तेरी ही अंगड़ाई है।
ये कैसी बारिश आई है।

तन मे गिरती हर बुँदों का,ख़लिश और तड़पाती है,
यादें तेरी नख-शिख की अब,रह-रहकर आती-जाती है।
काजल तेरे अब्सारों का,मांथे की बिंदिया दीवानी,
मुझको और सताती है,यादों का चुभन बढ़ाती है।
ऐसे मौसम में भी तेरे,यादों की बदली छाई है,
ये कैसी बारिश आई है।

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