शितलहरी

शाँन्त चित्त में जैसे इक,

उन्माद जगाती है,

सुबह-सुबह देखो शितलहरी,

कैसी आती है।

 

पेड़ों के साखों में आकर,

हर रोज़ जगाती है,

पत्तों से मिलकर वो,

रुनझुन गाती है।

शाँन्त झरोखे में भी तब,

खुशी लहराती है।

 

सुबह-सुबह देखो……….

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