उलाहना

पथरीली राहों पर तुम गुलाब माँगते थे,

हर बात का उछल कर जवाब माँगते थे।

वक्त का करवट देखो तुम्हें भी देना पड़ेगा,

जैसे तुम बात-बात पर हिसाब माँगते थे।

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