पत्रकार

आइना थे एक पक्ष के पक्षकार हो गए,

सियासत में पड़कर ये भी बेकार हो गए।

हर बात को सफाई से दुनिया को बताने वाले,

आज जाने क्यों बिकाऊ पत्रकार हो गए।

उलाहना

पथरीली राहों पर तुम गुलाब माँगते थे,

हर बात का उछल कर जवाब माँगते थे।

वक्त का करवट देखो तुम्हें भी देना पड़ेगा,

जैसे तुम बात-बात पर हिसाब माँगते थे।

शितलहरी

शाँन्त चित्त में जैसे इक,

उन्माद जगाती है,

सुबह-सुबह देखो शितलहरी,

कैसी आती है।

 

पेड़ों के साखों में आकर,

हर रोज़ जगाती है,

पत्तों से मिलकर वो,

रुनझुन गाती है।

शाँन्त झरोखे में भी तब,

खुशी लहराती है।

 

सुबह-सुबह देखो……….

अभी तो नहीं….

देश खोखला है, तिजोरी खाली है,

तो क्या कर्जा लेकर,ये भरने वाली है।

मुद्दों की बात भी कुछ करलो साहेब कभी,

गरीबरथ चलती नहीं,बुलेट कहाँ चलने वाली है।

गुरुग्राम हत्याकांड

शिक्षा का दर यूँ मौत का घर होगा, सोचा ना था वो मासूम यूँ बेघर होगा।

किसी का लाल हुआ साजिश का शिकार यहाँ, इस ग़म से न जाने कैसे आगे का सफर होगा।

माँ के टूटे सपने सजाएगा कौन, पिता के अरमान को लौटाएगा कौन,

वो खिलौने,वो कपड़े देख बिलखता होगा मन, इन्हें लेकर अब पढ़ने को जाएगा कौन।