रचनायें

बी. एच. यू.

महिला सशक्त तो परम ध्येय था, फिर तो क्या मसला अजेय था। क्यों निर्दयता पेश किया इस मसले पर, क्या जनता का यही असली विधेय […]

मेरा गाँव

हर रिश्ते में पहले लगाव सा था, रिश्ते निभाना जैसे स्वभाव सा था। जाने कहाँ खो गयी वो रमणीयता अब, पहले तो मेरा गाँव,एकदम गाँव […]

शितलहरी

शाँन्त चित्त में जैसे इक, उन्माद जगाती है, सुबह-सुबह देखो शितलहरी, कैसी आती है।   पेड़ों के साखों में आकर, हर रोज़ जगाती है, पत्तों […]

समसामयिकी

दुश्मन को पहचान कर भी गले लगाते हैं, किसी के विरोध की ये कैसी पराकाष्ठा है।

मुक्तक

नये मौकों से हाथ मिलाते रहिए, किस्मत को रोज़ आजमाते रहिए। असमंजस में पड़े रहना अच्छी बात नहीं, ठान लिया है तो परिणाम तक जाते […]

अभी तो नहीं….

देश खोखला है, तिजोरी खाली है, तो क्या कर्जा लेकर,ये भरने वाली है। मुद्दों की बात भी कुछ करलो साहेब कभी, गरीबरथ चलती नहीं,बुलेट कहाँ […]

गुरुग्राम हत्याकांड

शिक्षा का दर यूँ मौत का घर होगा, सोचा ना था वो मासूम यूँ बेघर होगा। किसी का लाल हुआ साजिश का शिकार यहाँ, इस […]